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समानता का अर्थ एवं परिभाषा तथा समानता के प्रकार

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समानता (Equality)

हमारे देश में ही नहीं अपितु विश्व भर में समानता का अभाव हमेशा से ही रहा, जिसके चलते कई वर्गों को जाति, धर्म, रंग-भेद, आदि के आधार पर विषेश प्रकार से मतभेदों का सामना करना पड़ा। हमारे भारतीय संविधान में समानता को विशेष स्थान दिया गया है। संविधान निर्माण से पहले हमारे भारतीय समाज में समानता का अभाव था । लेकिन संविधान निर्माताओं ने इसको समझा तथा इसके महत्व को जाना और इसी वजह से आज हमें समानता के अधिकारों कि प्राप्ति हुई । जिसके आधार पर हमें कई प्रकार कि समानता मिली जैसे: सामाजिक समानता, नैतिक समानता, कानूनी समानता आदि

इसके अतिरिक्त समानता कि परिभाषा एवं अर्थ तथा इसके प्रकारों को निचे स्पष्ट रूप में बताया गया है:-

समानता कि परिभाषा एवं अर्थ

सामाजिक सन्दर्भों के आधार पर समानता का अर्थ किसी भी समाज की उस स्थिति से लिया जाता है, जिसमें उस समाज में उपस्थित सभी लोग समान अधिकार या प्रतिष्ठा रखते हैं। अर्थात समाज में रह रहे लोगों को उनकी योग्यता अनुसार समान अवसर प्रदान किया जाना चाहिए तथा उनकी जाति, रंग, रूप, लिंग, धर्म आदि के आधार पर उनमें भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए।

इसके अतिरिक्त कई विद्वानों ने इसे अपनी बुद्धिमत्ता के आधार पर अलग अलग रुप में परिभाषित किया है:-

बार्कर (Barker) के अनुसार – समानता का आशय उस स्थिति से है जिसमे मुझे जो अधिकार प्राप्त है वह दूसरो को भी उसी रूप में मिले, तथा जो अधिकार अन्य नागरिकों को प्राप्त है वह मुझे भी प्राप्त हो।

लोसकी के मतानुसार – समानता का अर्थ यह नहीं होता है कि प्रत्येक व्यक्ति के साथ एक जैसा व्यवहार किया जाए या प्रत्येक व्यक्ति को समान वेतन दिया जाए, यदि एक मजदूर का वेतन प्रसिद्ध वैज्ञानिक या एक गणितज्ञ के बराबर कर दिया जाए तो इससे समाज का उद्देश्य नष्ट हो जाएगा, इसलिए समानता का अर्थ यह होगा कि कोई भी विशेष अधिकार वाला वर्ग नहीं रहे तथा सबकों विकास के लिए समान अवसर प्रदान किये जाए ।

समानता के विभिन्न प्रकार :

समानता कि आवश्यकता के आधार पर इसे कई प्रकारों में वर्णित किया गया है:-

1. प्राकृतिक समानता

प्राकृतिक समानता का अर्थ है कि प्रकृति ने सभी लोगों को समान रूप से जन्म दिया है, अतः प्रकृति के अनुसार सभी समान है। इस प्रकार सभी व्यक्ति जन्म से समान होते है और उनमे कोई असमानता नही पाई जाती है। लेकिन यह कथन पूर्ण रूप से उचित नहीं हो सकता क्योंकि समाज में उपस्थित लोगों में काफी भिन्नता देखने को मिलती हैं जैसे: कोई जन्म से विकलांग होता है, कोई बुद्धिमान तो कोई मूर्ख व्यक्ति भी होता है।
अतः इसका मतलब है कि प्रत्येक व्यक्ति के साथ प्राकृतिक रूप से समान व्यवहार करना चाहिए।

2. नागरिक समानता

नागरिक समानता का अर्थ है कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति को समान अवसर प्राप्त हो तथा सभी लोगों को नागरिक अधिकार और स्वतंत्रता समान रूप से मिलनी चाहिए। कानून की नजरों में सभी नागरिक बराबर होने चाहिए। जिससे नागरिकों के मन में राज्य के प्रति विश्वास की भावना जागृत हो सके, एवं विधि के शासन की स्थापना द्वारा नागरिक समानता को स्थापित किया जा सकता हैं ।

3. राजनीतिक समानता

राजनीतिक समानता से तात्पर्य ऐसी व्यवस्था से है जिसमें समाज के प्रत्येक व्यक्ति को राजनीतिक गतिविधियों में शामिल होने का पूर्ण अधिकार है । किसी भी व्यक्ति को उसके धर्म, रंग, जाति, जन्म आदि के आधार पर बिना किसी भेदभाव किये समान रूप से राजनीतिक अधिकार मिलना ही राजनीतिक स्वतंत्रता है। इस प्रकार राज्य की नजर मे सभी को समान माना जाना चाहिए । राजनीतिक समानता ही प्रजातंत्र कि मुख्य आधारशिला है। इसका उदा० मतदान करना व चुनाव लडना है

4. नैतिक समानता

नैतिक समानता इसका तात्पर्य यह है कि राज्य को देश की सभी संस्कृतियों, भाषाओं तथा साहित्य को विकसित होने का समान अवसर व सुविधा प्रदान करनी चाहिए। इसके लिए राज्य को सबके साथ निष्पक्षता का व्यवहार करना चाहिए। साथ ही साथ सबको शिक्षा का समान अधिकार प्राप्त होना चाहिए। अगर नैतिक समानता नहीं होगी तो धीरे धीरे हमारी संस्कृति खत्म हो जाएगी।

5. आर्थिक समानता

आर्थिक समानता का तात्पर्य अधिक धन कमाने से न होकर मनुष्य कि आवश्यकता पूर्ति से है आर्थिक समानता का अर्थ यह नहीं है कि सभी के पास बराबर धन उपलब्ध हो। बल्कि इसका अर्थ यह है कि सम्पत्ति और धन का उचित वितरण समाज के सभी लोगों में समान होना चाहिए। कोई भी व्यक्ति भूख से न मरे तथा कोई भी व्यक्ति इतना अधिक धन न जमा कर से कि वह दूसरों का शोषण करने लगे जाए।

6. कानूनी समानता

कानूनी समानता से तात्पर्य यह है कि कानून कि नजर में सभी लोग समान होते हैं, जिसके कारण कानूनी कार्यवाही के समय कानून को सभी लोगों के साथ समान व्यवहार करना चाहिए। एवं सभी सरकारी विभागों में किसी भी व्यक्ति को उसके धर्म, जाति, रंग, निवास स्थान आदि के आधार पर प्रताड़ित नहीं किया जा सके।

7. सामाजिक समानता

सामाजिक समानता का आशय समाज कि गतिविधियों से है, सामाजिक समानता कि दृष्टि से सभी व्यक्ति समान होने चाहिए तथा किसी को भी विशेषाधिकार प्राप्त न हो,समाज में सभी को विकास के समान अवसर व सहभागिता मिलती रहे इससे सामाजिक न्याय की अवधारणा परिपक्व होगी तथा समाज के सभी लोगों को समान अवसर प्राप्त होंगे।

8. सांस्कृतिक समानता

राज्य एवं समाज द्वारा बहुसंख्यक वर्ग एवं अल्पसंख्यक वर्ग के साथ समानता का व्यवहार करना, एक सांस्कृतिक समानता की श्रेणी में आता है । इन्हें अपनी भाषा, लिपि, संस्कृति तथा सामाजिक परिवेश के संरक्षण के समुचित अवसर प्रदान किये गयें है । हमारा संविधान सांस्कृतिक समानता हेतु मौलिक अधिकारों का प्रावधान करता हैं ।

9. शैक्षणिक समानता

शैक्षणिक समानता से तात्पर्य समान शिक्षा के अवसरों से है जिसके अन्तर्गत समाज के समस्त बच्चों को उनकी जाति,धर्म, रंग-भेद,छूआ छूत का भेद किए बिना समान अवसर प्रदान किए जाने चाहिएं । लेकिन यदि राज्य द्वारा समाज के कमजोर व पिछड़े वर्गों के लिए विशेष सुविधाएं उपलब्ध करवाई जाती है तो यह समानता का हनन करना नहीं हैं ।

समानता के आधारभूत तत्व :

  • सभी लोगों के साथ समान व्यवहार करना ही समानता हैं
  • सभी लोगों को विकास के लिए समान अवसर प्राप्त हो एवं समाज व राज्य सभी लोगों के साथ समान आचरण का व्यवहार करें ।
  • मानवीय गरिमा तथा अधिकारों को समान संरक्षण प्राप्त होना चाहिए ।
  • समाज में किसी व्यक्ति के साथ जाति, धर्म, भाषा, लिंग, निवास स्थान, सम्पति, राष्ट्रीयता आदि के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाए ।
  • प्रत्येक व्यक्ति को समाज में समान महत्व दिया जाए ।
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